रिपोर्ट
राकेश रंजन
रायपुर

 प्रथम चरण में  8 स्थानों को चिन्हित किया गया सीतामढ़ी-हरचौका, रामगढ़, शिवरीनारायण, तुरतुरिया, चंदखुरी, राजिम, सिहावा (सप्त ऋषि आश्रम) और जगदलपुर को विकसित किया जाएगा


रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार राम वन गमन पथ पर पड़ने वाले महत्वपूर्ण स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करेगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में आज विधानसभा के समिति कक्ष में आयोजित कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया। पर्यटन स्थलों के सर्वेक्षण के लिए चार सदस्यीय टीम गठित की जाएगी। विभिन्न शोध प्रकाशनों के अनुसार प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में वनगमन के दौरान लगभग 75 स्थलों का भ्रमण किया। जिसमें से 51 स्थल ऐसे हैं, जहां प्रभु राम ने भ्रमण के दौरान रूककर कुछ समय व्यतीत किया था। राम वनगमन स्थलों में से प्रथम चरण इनमें से 8 स्थलों का पर्यटन की दृष्टि से विकास हेतु चयन किया गया है। इन स्थलों में कोरिया जिले के सीतामढ़ी-हरचौका, सरगुजा जिले के रामगढ़, जांजगीर-चांपा जिले के शिवरीनारायण, बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के तुरतुरिया, रायपुर जिले के चंदखुरी, गरियाबंद जिले के राजिम, धमतरी जिले के सिहावा (सप्त ऋषि आश्रम) और बस्तर जिले के जगदलपुर शामिल हैं।
उपरोक्त प्रस्तावित 8 स्थलों का चार विभागीय सदस्यों की टीम बनाकर सर्वे कराया जाएगा तथा आवश्यकता के अनुसार वहां पहुंच मार्ग का उन्नयन, साईनजेस, पर्यटक सुविधा केन्द्र, इंटरप्रिटेशन सेंटर, वैदिक विलेज, पगोड़ा, वेटिंग शेड, मूलभूत सुविधा (पेयजल व्यवस्था/शौचालय), सीटिंग बेंच, रेस्टोरेंट, वाटर फ्रंट डेव्हलपमेंट, विद्युतीकरण आदि कार्य कराए जाएंगे। राम वन गमन मार्ग में आने वाले स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का काम रायपुर जिले के आरंग तहसील के गांव चंदखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर से प्रारंभ किया जाएगा। इस योजना के लिए राज्य सरकार द्वारा बजट उपलब्ध कराया जाएगा साथ ही साथ भारत सरकार पर्यटन मंत्रालय की योजनाओं से भी राशि प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा, इससे इन स्थलों का राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रचार हो सकेगा।
शोधार्थियों के अनुसार छत्तीसगढ़ का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही प्रशस्त है। त्रेतायुगीन छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम दक्षिण कौसल एवं दण्डकारण्य के रूप में विख्यात था। दण्डकारण्य में भगवान श्रीराम के वनगमन यात्रा की पुष्टि वाल्मीकि रामायण से होती है। शोधकर्ताओं के शोध किताबों से प्राप्त जानकारी अनुसार प्रभु श्रीराम के द्वारा अपने वनवास काल के 14 वर्षों में से लगभग 10 वर्ष से अधिक समय छत्तीसगढ़ में व्यतीत किया गया था। छत्तीसगढ़ के लोकगीत में माता सीता जी की व्यथा, दण्डकारण्य की भौगोलिकता एवं वनस्पतियों के वर्णन भी मिलते हैं जैसे –
‘‘अटकन बटकन दही चटाका, लउहा लाटा, बन में कांटा,
सावन में करेला फूले, चल चल बेटी गंगा जाबो,
गंगा ले गोदावरी, पाका पाका बेल खाबो,
बेल के डारा टूट गे, भरे कटोरा फूट गे, अउ ब्याहता छूट गे’’
प्रभु श्रीराम के द्वारा उत्तर भारत से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करने के बाद छत्तीसगढ़ में विभिन्न स्थानों पर चैमासा व्यतीत करने के बाद दक्षिण भारत में प्रवेश किया गया था। अतः छत्तीसगढ़ को दक्षिणापथ भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में कोरिया जिले के भरतपुर तहसील में मवाई नदी से होकर जनकपुर नामक स्थान से लगभग 26 कि.मी. की दूर पर स्थित सीतामढ़ी-हरचैका नामक स्थान से प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया। इस राम वनगमन पथ के विषय पर शोध का कार्य राज्य में स्थित संस्थान ‘‘छत्तीसगढ़ अस्मिता प्रतिष्ठान, रायपुर’’ के द्वारा किया गया है। इसमें श्री मन्नू लाल यदु के द्वारा ‘‘दण्डकारण्य रामायण’’ किताब का प्रकाशन किया गया है तथा इसी विषय पर डाॅ. हेमु यदु के द्वारा भी ‘‘छत्तीसगढ़ पर्यटन में राम वनगमन पथ’’ के नाम से पुस्तक का प्रकाशन किया गया है।
इन शोध किताबों के अनुसार प्रभु श्रीराम के द्वारा छत्तीसगढ़ में वनवास के 10 वर्षों के दौरान छत्तीसगढ़ में वनगमन के दौरान जिन स्थलों का प्रवास किया गया उनमें कोरिया जिले के सीतामढ़ी-हरचैका, सीतामढ़ी-घाघरा, कोटाडोल, सीतामढ़ी-छतौड़ा (सिद्ध बाबा आश्रम) देवसील, रामगढ़ (सोनहट), अमृतधारा, सरगुजा जिले के देवगढ़, जशपुर जिले के किलकिला (बिलद्वार गुफा), सारासोर, सरगुजा जिले के सीताबेंगरा (रामगढ़ पहाड़ी), महेशपुर, बंदरकोट (अंबिकापुर से दरिमा मार्ग), मैनपाट, मंगरेलगढ़, पम्पापुर, जशपुर जिले के रकसगण्डा, जांजगीर-चांपा जिले के चंद्रपुर, शिवरीनारायण, खरौद, जाजंगीर, बिलासपुर जिले के मल्हार, बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के धमनी, पलारी, नारायणपुर (कसडोल), तुरतुरिया, महासमुंद जिले के सिरपुर, रायपुर जिले के आरंग, चंद्रखुरी, गरियाबंद जिले के फिंगेश्वर, रायपुर जिले के चम्पारण्य, गरियाबंद जिले के राजिम (लोमष ऋषि, कुलेश्वर, पटेश्वर, चम्पकेश्वर, कोपेश्वर, बम्हनेश्वर एवं फणिकेश्वर), धमतरी जिले के मधुबन धाम (राकाडीह), अतरमरा (ग्राम अतरपुर), सिहावा (सप्त ऋषि आश्रम), सीतानदी, कांकेर जिले के कांकेर (कंक ऋषि आश्रम), कोण्डागांव जिले के गढ़धनोरा (केशकाल), जटायुशिला (फरसगांव), नारायणपुर जिले के नारायणपुर (रक्सा डोंगरी), छोटे डोंगर, दंतेवाड़ा जिले के बारसूर, बस्तर जिले के चित्रकोट, नारायणपाल, जगदलपुर, दंतेवाड़ा जिले के गीदम, दंतेवाड़ा, बस्तर जिले के तीरथगढ़, सुकमा जिले के तीरथगढ़, रामाराम, इंजरम और कोन्टा शामिल है।
इन शोध प्रकाशनों के अनुसार प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में वनगमन के दौरान लगभग 75 स्थलों का भ्रमण किया। जिसमें से उक्त 51 स्थल ऐसे हैं, जहां प्रभु राम ने भ्रमण के दौरान रूककर कुछ समय व्यतीत किया था। शोधकर्ताओं ने अपने शोध के दौरान प्रभु श्रीराम के इन स्थलों में भ्रमण किए जाने की पुष्टि की गयी है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा इन राम वन गमन पथ का पर्यटन की दृष्टि से विकास की योजना पर कार्य किया जा रहा है। इनके विकास का उद्देश्य राज्य में आने वाले पर्यटकों, आगंतुकों के साथ-साथ राज्य के लोगों को भी इन राम वन गमन मार्ग एवं स्थलों से परिचित कराना है। इनके विकास के इन स्थलों का भ्रमण करने के दौरान पर्यटकों को सुविधा हो सके इसका ध्यान रखा जाएगा।