संपादक की कलम से
डॉ रविंद्र द्विवेदी

बैल की जगह मशीनों ने ली

बैल  की जगह मशीनों ने  ली

देशी गाय का दुध अमृत समान होता हैं व्यापारिक सोच उनके पतन का कारण

देशी गाय का दुध  अमृत  समान  होता हैं  व्यापारिक सोच  उनके पतन का कारण

किसानों की समस्या गहन अध्ययन कर चिन्हित किये आखिर इतने आवारा क्यों घूम रहे देशी गाय बैल

किसानों के लिए बैल कभी "वरदान"थे आज "अभिशाप"बन गए हैं। 

बढ़ती जनसंख्या का सबसे बड़ा दबाव "काश्त"  पर पड़ा है। मशीनीकरण से, हाइब्रिड बीजों से ,और रासायनिक खाद से, मांग के अनुसार उत्पादन बढ़ा है किंतु मशीननीकृत होने से बैलों की उपयोगिता समाप्त सी हो गई है, जिससे उनकी बढ़ती जनसंख्या किसानों के लिए "अभिशाप" साबित हो रही है। 

 

बैलों से जुताई/बुबाई/गहाई का काम अब लगभग समाप्त होता जा रहा है ,"ऐरा प्रथा" से किसान टूट रहे हैं इसका सर्वसम्मति से कोई हल ग्राम समाज को ही ढूंढना होगा झुंड के झुंड पालतू पशु ऐरा बनकर खेती को एवं काश्तकारों को चौपट कर रहे हैं। 

भूमि बंटवारे से भूमि का स्वामित्व घटा है हमारी भूमि कम है और पडोसी की ज्यादा है इसका संदेह  भी बढ़ा है, इस काम को दुरुस्त करने में लगे कर्मचारी भी कई बार पूर्वाग्रह से युक्त होकर मापन करते हैं जिससे संदेह को बल मिलता है विवादों के कारण बहुत सी भूमि "पड़ती" पड़ी है जिससे किसानों को नुकसान होता है। 

लोक जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्तियों को ऐसी समस्याओं के निपटारे के लिए आगे आना होगा।

मुख्यमंत्री  भुपेश  बघेल  का नरवा घुरवा  योजना  एक सराहनीय   पहल है इससे  पशुधन का पालन एवम किसानों  की फसल को  होने वाले नुकसान  से बचाया जा सकता है ।।